आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चेतना जब-जब हुंकारेगी, तख्त पलटेंगे सब इस बार।

                
                                                         
                            न्याय-प्रासाद प्रमादित बैठा, बलि चढ़ती है सत्य सँवार।
                                                                 
                            
स्वार्थ-विवाद बढ़ा है जग में, टूट रहा अस्मिता-विहार॥

आलोकित घर घिरने आया, रजनी का यह क्रूर प्रहार।
मौन-हुक्म से कलम थमी है, काल-विषैला है संसार॥

चेतना निश्छल ताप सह रही, पुण्य-शिखा पर तिमिर-दुराचार।
मद-अंधे शासक सुन ले रे, मौन नियति का रथ तैयार॥

सत्य-लौ को जो बुझा सके रे, जन्मा नहीं कोई बलकार।
तपोमयी यह राख की ढेरी, अंत बनेगी तीव्र अंगार॥

काँच-महल के वासी सुन लो, पत्थर मारो न सरकार।
जन-रोष की ज्वाला भड़केगी, मचेगा तब तो हाहाकार॥

चेतना जब-जब हुंकारेगी, तख्त पलटेंगे सब इस बार।
मर्दन सत्य का काल-गति को, कभी नहीं होगा स्वीकार॥
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
56 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर