न्याय-प्रासाद प्रमादित बैठा, बलि चढ़ती है सत्य सँवार।
स्वार्थ-विवाद बढ़ा है जग में, टूट रहा अस्मिता-विहार॥
आलोकित घर घिरने आया, रजनी का यह क्रूर प्रहार।
मौन-हुक्म से कलम थमी है, काल-विषैला है संसार॥
चेतना निश्छल ताप सह रही, पुण्य-शिखा पर तिमिर-दुराचार।
मद-अंधे शासक सुन ले रे, मौन नियति का रथ तैयार॥
सत्य-लौ को जो बुझा सके रे, जन्मा नहीं कोई बलकार।
तपोमयी यह राख की ढेरी, अंत बनेगी तीव्र अंगार॥
काँच-महल के वासी सुन लो, पत्थर मारो न सरकार।
जन-रोष की ज्वाला भड़केगी, मचेगा तब तो हाहाकार॥
चेतना जब-जब हुंकारेगी, तख्त पलटेंगे सब इस बार।
मर्दन सत्य का काल-गति को, कभी नहीं होगा स्वीकार॥
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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