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मतलब का मेला और अकेला इंसान

                
                                                         
                            जब जेब में पैसा होता है,
                                                                 
                            
सब कहते हैं "तुम हमारे हो।"
महफ़िल में इज़्ज़त मिलती है,
तुम सबकी आँख के तारे हो।

बुरा वक्त आते ही देखो,
सब असली रंग दिखाते हैं।
जो साये की तरह साथ थे,
वो रास्ता बदल कर जाते हैं।

रिश्तेदार भी बदल गए सब,
जो अच्छे दिनों में आते थे।
दु:ख की घड़ी में छोड़ गए,
जो बढ़-चढ़कर अपनाते थे।

कोई दोस्त नहीं, कोई यार नहीं,
यह दुनिया मतलब का मेला है।
भीड़ खड़ी थी कल तक जहाँ,
आज वो इंसान अकेला है।

हद तो तब हो जाती है,
जब घर से भी ताने आते हैं।
"कुछ काम करो, क्यों बैठे हो?"
माँ-बाप भी यह कह जाते हैं।

पर टूटना मत इस मुश्किल में,
यह वक्त भी एक दिन बदलेगा।
जो आज तुम्हें दुत्कार रहे,
कल उनका भी सिर झुकेगा
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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48 मिनट पहले

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