भोलेपन की इस माटी को, पैरों से रौंदा जाता है,
यहाँ हर बहते आँसू को, पानी ही समझा जाता है।
बड़ी मुद्दतों में चुन-चुनकर, एक नीड़ भरोसे का बदला,
पर खेल समझकर पलभर में, उसे तिनका-तिनका बिखराया।
जो धागा था विश्वास का, वो टूट गया तन्हाई में,
अब लाख जतन कर जोड़ें तो, इक गाँठ बची परछाईं में।
वह गाँठ चुभती है हरदम, जब-जब कोई पास आता है,
जो दिल कल तक था आईना, अब साए से कतराता है।
क्यों लोग यहाँ जज्बातों को, शतरंज की चाल बना बैठे?
मासूम हँसी के पीछे क्यों, छलावे का जाल बना बैठे?
इक बार जो उजड़ी ये बस्ती, फिर लाख बसाओ बसती नहीं,
टूटी हुई रूह की ये सिसकी, बाज़ारों में कभी बिकती नहीं।
खामोश खड़े हैं बंद कपाट, अब भीतर कोई शोर नहीं,
तुम ढूंढ रहे हो जिस दिल को, अब उस दिल पर ज़ोर नहीं।
विश्वास जो एक दिन रूठ गया, वो लौट के फिर ना आएगा,
यह रोता हुआ मंज़र जग का, पत्थर को भी पिघलाएगा।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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