भीतर जिसके आग है, बाहर वही प्रचंड।
तोड़ गिराए पलक में, सत्ता का पाखंड।।
युवा लहू जब गर्जेगा , थर-थर काँपे क्रूर।
सिंहासन जो अंधा है, होगा चकनाचूर।।
रोक न पाओगे तुम अब, मेरी इस तरुणाई को,
झुका न पाओगे तुम अब, सच की ऊँचाई को।
हक की खातिर उठने वाली, कड़क आवाज़ हूँ मैं,
इस गूंगे-बहरे शासन का, नया आगाज़ हूँ मैं।
घोंटेगा जो गला सत्य का, डूबेगा अंधकार में,
क्रांति लाऊंगा मैं अब, दु:शासन के दरबार में!
हाथों में जो कलम है थामी, वो बारूदी शक्ति है,
भ्रष्ट तंत्र की नींव हिलाना ही मेरी भक्ति है।
बुझने न दूंगा मशाल वो, जो पुरखों ने जलाई थी,
भूल गए क्या शौर्य गाथा, जो वीरों ने गाई थी?
हर पासा मैं पलट दूँगा, इस नफ़रत के व्यापार में,
क्रांति लाऊंगा मैं अब, दु:शासन के दरबार में!
तुम चाहे जो बाधा डालो, पर राहें रोक न पाओगे,
फूँक चुका हूँ जो चिंगारी, उसे बुझा न पाओगे।
घेरा है अभिमन्यु समझकर, गांडीव सा संधान करूँगा,
अत्याचारी इस लंका का मैं पूर्ण विराम करूँगा।
दबा न पाओगे यह ज्वाला, इस भयानक अत्याचार में,
क्रांति लाऊंगा मैं अब, दु:शासन के दरबार में!
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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