धरा की धूल से जो देश का गौरव बढ़ाता है
कड़कती धूप में भी जो सोई क़िस्मत जगाता है,
बहाकर खून-पानी जो यहाँ सोना उगाता है,
पसीना बेच कर अपना जो यह दुनिया चलाता है।
कभी सावन की रातों में जो खेतों में ही सोता है,
कड़कती ठंड की ठिठुरन में जो हर बीज बोता है,
न थकन का नाम है, ना विपदा में वह रोता है,
वही माटी का योद्धा है जो सब कुछ अपना खोता है।
फटे कपड़ों में रहकर जो सभी का तन सजाता है,
सूखी रोटी चबाकर जो मधुर फसलें उगाता है,
महाजन के बही-खातों में जो दिन-रात गलता है,
वही इस देश का गौरव, वही भाग्य विधाता है।
शहर के तड़क-भड़क वाले छलावे छोड़ आता है,
वो अपनी सादगी से हर किसी का दिल चुराता है,
बवंडर सामने आए तो उसका रुख घुमाता है,
विपत्ति काल में भी जो विजय के गीत गाता है।
सिपाही सरहदों पर जिस तरह कर्ज़े चुकाता है,
ये खेतों में खड़ा योद्धा उसी तरह निभाता है,
झुका दे जो पहाड़ों को, वही हल को चलाता है,
यही माटी का महायोद्धा नया इतिहास बनाता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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