देख कुनबे का भग्न भाल जब मर्यादा का मान घटा,
रक्त-वंश की पावन छाँह पर छाया था जो तमस घना;
ओट-द्वार की आड़ छुपाकर साक्ष्यों को जो काट रहे,
अपनी ही मर्यादा का शव भरी सभा में बाँट रहे;
गुप्त रूप से मिलकर वे जो लाज की सीमा तोड़ गए,
कुल के ऊँचे सिंहासन को मिट्टी के संग जोड़ गए।
खुद गिरकर कालिख के दलदल में जो ऐंठ दिखाती है,
औरों की निर्मल वाणी पर अपनी उँगली उठाती है;
अड़ियल और नकचढ़ी चेतना जिसकी अपनी जर्जर है,
उसे न कुल की साख का डर है, न पुरखों का परहर है;
खो बैठी वह मान-प्रतिष्ठा, धुंधला उसका हर एक भाग,
चली सिखाने जग को अक्ल, छुपा न पाई खुद का दाग।
फिर जनम-दिवस का स्वांग रचा, माँ-बाप से झूठ उचारा था,
कुल की जो पतवार बची थी, उसे स्वयं ही मारा था;
संग सहेली को ले जाकर पर-घर में जो मोद मना,
माता-पिता के उस भरोसे का पल भर में ही कत्ल हुआ,
वस्त्र लिए उपहार लिए और बंद झरोखों नाच उठी,
कुल-लाज की सारी मर्यादा क्षण भर में ही वहाँ लुटी।
जिसे समझती थी अनुराग, वह हवस की गंदी राह निकली,
तनिक न जिसके भीतर मर्यादा की कोई चाह दिखी;
उस वासना के छली यार ने सारा सच ही खोल दिया,
सब लड़कों के बीच बैठ कर हँसकर सब कुछ बोल दिया;
क्या हफ़्तों का, क्या घंटों का, वह केवल एक खेल रहा,
जग-हँसाई की महफ़िल में, उसका झूठा प्यार ढहा।
समय रहते उस भोले भाई को जब सारा भेद मिला,
कुल की साख बचाने का तब भ्राता को ही खेद मिला;
फटकार लगाई तुमको पर, दिल में बस एक दया ही थी,
तुमने फिर भी सुधरने की, कोई राह न पकड़ी थी;
जो राह चुनी है तबाही की, वह केवल विनाश का घेरा है,
लौट आओ इस जाल से अब भी, आगे घोर अँधेरा है। लौट आओ इस जाल से अब भी, आगे घोर अँधेरा है....
लौट आओ इस जाल से अब भी, आगे घोर अँधेरा है। लौट आओ इस जाल से अब भी, आगे घोर अँधेरा है...
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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