तुम्हारे मौन अधरों की कहानी जानते हैं हम,
हृदय के रीते घट का वो पानी जानते हैं हम।
भले ही जग हमारी प्रीत को अपराध लिख डाले,
तुम्हारी वंदना की हर निशानी जानते हैं हम।
तपती रेत पर जो एक सावन बूँद गिरती है,
तुम्हारी याद बनकर वो मेरे अंतस में फिरती है,
हमारी हार पर ये जग भले ही आज हँसता हो,
मगर सूखी हुई उस डाल से ही कोंपल खिलती है।
किसी सूने झरोखे पर बंधा वो सूत्र साक्षी है,
तुम्हारी राह तकती आँख का हर चित्र साक्षी है,
लिया था नाम जिसका साँस की हर एक हलचल में,
हमारी साधना का वो अकेला मित्र साक्षी है।
बहाकर नाव काग़ज़ की जो तुम तक भेज दी मैंने,
प्रतीक्षा की कठिन वो धूप हँसकर झेल ली मैंने,
नदी का वेग ही जब मोड़ ले आया पराजय पर,
तटों की रेत पर फिर अपनी क़िस्मत लिख दी मैंने।
प्रदीप की लौ जो तुम बिन रात भर जलकर सुलगती है,
हवा के हर झोंके से वो सहम कर और जगती है,
भुला पाया नहीं तुमको मेरा यह चित्त भी पल भर,
तुम्हारी दूरी ही अब रूह की जागीर लगती है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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