अंतर्ज्वाला विकल दहकती,
चेतन-सत्ता मौन सिसकती।
हृदय-शून्य में तिमिर विहँसता,
काल-व्याल बन मन को डसता।
नियति-नटी का क्रूर अट्टहास,
सोख रहा अंतस का उच्छ्वास।
स्मृति-कणिका बन शूल चुभ रही,
शून्य गगन में तड़ित् दुभ रही।
लोचन से जो ढलका नीरद,
दे न सका वह सुख का पारद।
अश्रु-धार बन बही विभावरी,
व्याकुल भई सृष्टि की चातरी।
मौन-एकांतिक गिला हृदय का,
मिश्र-राग यह विरह-उदय का।
तुम सम तुम हो, अलख-अगोचर,
भटक रहा मन बनकर चर-अचर।
प्राण-स्पंदन विथकित-व्याकुल,
साँसें लेतीं विरह-व्याकुल।
मलय-समीर सुलगती बन अलि,
हृदय-कमल की बिखरी पंखुरि।
क्षणभंगुर इस जग का मेला,
प्राणी आया यहाँ अकेला।
माया-जाल विनिर्मित सारा,
बहती केवल दुख की धारा।
मैं हूँ सिस्टर, तुम सम तुम हो,
महा-शून्य के भीतर तुम हो।
मिटा न अब तक द्वैत-कुहासा,
भटक रही अंतस की प्यासा।
बिखरा मानस-मुकुर अभागा,
सोया भाग्य न फिर से जागा।
अनाहत-नाद विलीन हुआ अब,
मौन-महाव्रत लीन हुआ सब।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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