विचारों के झंझावातों में जब विवेक खो जाता है,
शांत हृदय का दर्पण भी तब धुंधला सा हो जाता है।
बाहर की दुनिया में हम जिसे ढूँढते फिरते हैं,
वह सत्य हमारे भीतर ही चुपके से सो जाता है।
जैसे तपन धरा की सहकर घन मेघ मल्हार सुनाते हैं,
वैसे ही कष्टों के तप से अनुभव परिपक्व हो जाते हैं।
जब तक न टकराए ठोकर इस जड़ पाषाण से जीवन की,
तब तक न चेतना के दीपक मन में लौ रख पाते हैं।
गतिमान समय के पहियों पर कब किसका वश चल पाया है,
मिट्टी के इस पुतले ने यहाँ व्यर्थ ही गर्व दिखाया है।
जो बीत गया वह तो केवल इक परछाई का साया है,
वर्तमान के इस क्षण में ही सच की सुंदर काया है।
मृगतृष्णा के इस मरुथल में मन प्यासा ही रह जाता ,
झूठे सुख की अभिलाषा में दुख की नदियों को बहाता ।
इच्छाओं की इस जंजीर को जो तनिक यहाँ तोड़ पाता है,
अविचल रहकर इस दुनिया में वही शिखर छू पाता है।
जब शब्द थमेंगे होठों पर तब मौन मधुर हो जाएगा,
भीतर का यह कोलाहल भी शांत कहीं हो जाएगा।
जब एकांत के दर्पण में तू खुद से आँख मिलाएगा,
ब्रह्मांड समूचा तब तेरे उर की स्पंदन दोहराएगा ।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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