वो दूरियाँ मीलों की भी जिन्हें कभी न डराती थीं,
वो कच्चे रास्तों की धूल भी जिनके हौसले बढ़ाती थी।
न गाड़ी थी, न चिट्ठी थी, न कोई साधन पास था,
मगर हर दिल में मिलने का एक अटूट विश्वास था।
दूर-दूर से पैदल चलकर लोग गले मिल जाते थे,
वक़्त बहुत था पास सभी के, सब -कुछ बाँट के खाते थे।
पर आज का दौर...
वो साधन आज हज़ारों हैं जो पल में दुनिया दिखाते हैं,
मगर वही साधन इंसानों को इंसानों से दूर ले जाते हैं।हाथों में मोबाइल थामे सब अपनी धुन में चूर यहाँ,
पास खड़े हैं फिर भी देखो, हर एक शख़्स मजबूर यहाँ।कोई न किसी की चिंता करता, सब अपनी माया बुनते हैं,
अब कहाँ लोग ठहरकर, किसी ग़ैर की दास्ताँ सुनते हैं।
ये कैसी दूरी है...
जो कल तक ज़िगर के टुकड़े थे, आज वही अनजाने हैं,
दुनिया तो बहुत आगे बढ़ गई, पर रिश्ते हुए पुराने हैं।
सब कुछ पाकर भी इंसान आज अपनी कहानी रोता है,
भीड़ बहुत है बाज़ारों में, पर कोई न अपना होता है:
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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