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खुद को जानने की चाह मेरी और आबाद हुई।

                
                                                         
                            मैं दस्तक देता रहा, वो दूर जाती रही
                                                                 
                            
ख़ामोशियां भी मजाक उड़ाती रही;
चाह थी सुकून की, यूं ही समय वार दी
मंज़िल तक पहुँचने में नींद भी दुश्वार की।

जतन सारी लोगों की ज़ुबानी हुई
निकम्मो से शुरू मेरी कहानी हुई;
ग़र कोई खता हुई, तुझको पाने की चाह हुई
मेरी हर कोशिश नाकामयाब हुई।

ज़माने की फ़िक्र नहीं, न अपनो की बात हुई
खुद में ही सिमटे रहे, अब दूरी का अहसास हुई;
टूटा तो तब भी नहीं, न आज मेरी हार हुई
खुद को जानने की चाह मेरी और आबाद हुई।
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एक घंटा पहले

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