जाने से पहले सो जाओ तो,
वह सिर्फ एक रात होती है लेकिन,
अगर तुम नहीं सोते हो तो,
यादों का समंदर होता है,
मैं हमेशा की तरह इस बार भी जाने से पहले बैठा हुआ हूं,
अकेली इस रात में चांद और हवाओं के साथ,
मैं सोच रहा हूं बैठे-बैठे इस एकांत में,
मैं सोच रहा हूं, ये छत, ये दीवारें, ये कमरे, ये हवाएं,
ये रातों का सूनापन मैं महसूस कर पा रहा हूं,
एक वक्त था जब इन सब चीजों को मैं अपना बोला करता था,
एक स्वाभिमान की अनुभूति उत्पन्न होती थी जब मैं बोलता था मैं यहां रहता हूं,
एक अजीब सी आज़ादी का एहसास होता था,
हवाओं में महक थी, फ़िज़ाओं में रवानगी थी, घटाओं में चहक थी
लेकिन अब,
अब मैं आता हूं यहां एक गुमनाम की तरह,
एक अजनबी की तरह आता हूं इसके गलियों में ठहरता हूं,
और हजार यादों के साथ खुद को डूबा हुआ पाता हूं,
उस गैलरी को सलीके से निहारता हूं, इन दीवारों को घूरता हूं,
उस हवाओं को महसूस करता हूं, रातों के सूनापन में बैठता हूं, देर तक आसमां को निहारता हूं,
फिर मैं धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ जाता हूं,
वहां कुछ देर ठहरता हूं, अपने कमरे के ऊपर लिखा हुआ वो S 16 नंबर को बहुत देर तक निहारता हूं,
मन करता है एक बार बस एक बार अंदर जा कर सब कुछ फिर से महसूस करूं,
उन दीवारों को देखूं, उस अलमीरे को निहारूं,
उसी टेबल को देखूं, उसी चौकी पे एक आखिरी बार जी भर कर सुकून के साथ सोऊं,
उसी कुर्सी पे बैठ कर पढूं, एक शांत सा संगीत सुनूं
वही रात के अंधेरे में चाय/कॉफी के चुस्कियों के साथ पर,
सहसा मैं सहम जाता हूं, अचानक कमरे के खुलने की आवाज आती है, एक लड़का तेजी के साथ बाहर निकलता है तैश में,
जो कमरा कल तक मेरा था, मेरे नाम से जाना जाता था
उसमें आज कोई और था,
वो हमसे पूछता है कौन हैं आप कौन से ईयर से?
उसे लगा मैं की नया नया जूनियर हूं जो उसके निजता में हनन पैदा कर रहा हूं,
मैं 5 सेकंड तक चुप रहता हूं फिर बोलता हूं,
मैं ये हूं, इस सेशन का हूं, सन् इतने से इतने तक यहां रहा हूं,
फिर आवाज आती है "गुड इवनिंग भैया",
मैं भी सहज उसे स्वीकार करता हूं फिर आगे बढ़ जाता हूं,
मन में बेचैनी होती है कि न कुछ तो कम से कम एक बार अंदर जा कर सब कुछ निहार तो लूं
लेकिन, संकोच के मारे कह नहीं पाता हूं,
छत, जो मेरे रात का आश्रय हुआ करता था, वहां जाता हूं,
उस फर्श को देखता हूं जिसपे न जाने कितनी रातें मैंने बिताई होती है,
न जाने कितनी बार देर तक अंधेरे में चुपचाप बैठा रहता था,
सब सोचता हूं लेकिन,
एक तेज़ हवा का झोंका आता है और चेहरे पे थपेड़े मारता हुआ सा चला जाता है,
जैसे वो कह रहा हो, ये जगह तुम्हारा था, है नहीं!
अब तुम्हे यहां वो सुकून नहीं मिलेगा जिसके लिए तुम भटकते हुए आए हो,
अब मैं...
अब मैं तुम्हे वो कुछ भी नहीं दे सकूंगा, जिसकी तुम्हें चाहत है, जिसकी तुम्हें आदत है,
जिससे तुम्हें बेइंतहा सुकून की अनुभूति होती है, एक अजीब सी ऊर्जा का संचार होता है,
वैसा कुछ भी नहीं है अब मेरे आँचल में जो मैं तुम्हे दे सकूं,
मैं कहता हूं इस जगह से बस एक अंतिम बार मिल जाता तो अच्छा रहता, यादें हमेशा ऐसी रहती,
वो कहती है, यादें ही बस साथ होती है ताउम्र के लिए, हम नहीं रहेंगे,
मेरे पास अब वो है ही नहीं जो तुम्हे दूं, जो था सब दे दिए,
लेकिन अब अंतिम बार भी मेरे पास तुमको देने के लिए कुछ नहीं है,
मैं ये बातें मौन होकर बड़े ही ध्यान से सुनता हूं,
फिर सोचता हूं, कह तो सही ही रही है,
अब जब भी यहाँ आता हूँ, वैसा महसूस कभी नहीं हुआ जैसा होता था,
अब उस सुकून की जगह एक अजीब सी बेचैनी ने ले ली है,
जो जब भी मैं यहां आता हूं, पुराने दिनों को सोचते हुए वर्तमान को देख कर सिहर सा जाता हूं,
खैर यही ज़िन्दगी है,
जो पल है बस उतना तक ही है,
वो बीत जाने के बाद अंतिम बार एक बार फिर से महसूस करने के लिए शायद कभी न मिले...
-रोहित भारद्वाज
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