आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ताज महल

                
                                                         
                            ताज कोई मोहब्बत की निशानी नही
                                                                 
                            
ये कोई प्यार की कहानी नहीं
लोग मरे हैं इसकी शान बड़ाने के लिए
ये मौत का किला है इसमें कोई हैरानी नहीं

लोग कहते हैं उलफ़त का महल
इसे चाँद का दीदार कहा जाता है
हाथ कटते हैं लोगों के पहले
फिर इसे ताज कहा जाता है

लोग खिंचवाते हैं फोटो महताब में इसकदर
कोई वहाँ अपनी मोहब्बत को बाँहों में ले चूमता है
अगर खुदा है ये मोहब्बत का शहर है
तो बता वो लड़का अकेला क्यूँ घूमता है

हज़ारों मोहब्बतें बिछड़ गयीं एक मोहब्बत का महल बनाने में
एक पल न लगा तुमको इसे प्यार का महल बताने में
लोग गए और घूरा इसको अपना दिल बहलाने को
क्या कोई बताएगा मुझको क्या छुपा रखा तहखाने में

मुमताज़ थी सोलहवीं बीबी तो पन्द्रह का क्यूँ कोई नाम नही
लोग मर गये जो हज़ारों उनकी मोहब्बत का क्यूँ कोई नाम नहीं

रोहित अग्रवाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर