वो चौदवीं के चाँद-से आ गए फ़लक पर,
हम अपलक खड़े बाम से उन्हें ताकते रहे।
बेख़ुदी बढ़ती रही, और शब ढलती रही,
ख़्वाब कुछ पलते रहे, हम रात भर जागते रहे।
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