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भोर की पहली किरण

                
                                                         
                            भोर की पहली किरण बनकर छू लो मुझको
                                                                 
                            
फिर मेरी मौत एक पल में गुजर जायेगी।
बुझी बुझी सी उमंगों को बांध लो मेरी
मेरी हर साँस तेरे साये में ठहर जायेगी।
एक गुमनाम लम्हा तुम्हें पास बुलाता है मेरे
कि कोई दस्तक पैगाम तेरा पास लायेगी।
मेरे आँखों के आईने में तेरा चेहरा है
जिसकी चाहत मुझे यूँ दिन रात रुलायेगी।
रात का पहला पहर बनकर सुला दो मुझको
कि मेरी जिंदगी मोम सी जम जायेगी।
सोचा था खुशबुओ से साँसें बसाएंगे
कि बिखरी हुई यादों में तेरी महक आयेगी।
रात का पहला पहर बनकर सुला दो मुझको
फिर मेरी मौत भी यूँ आसान हो जायेगी।
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4 वर्ष पहले

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