कितना सुहाना था वो जमाना
बचपन था ऐसा खजाना
न किसी से जलन; न किसी से भेदभाव
सच्चा सा मिलन अौर आपसी सद्भाव
वो खुशियों का मंच ;वो दोस्ती का रंगमंच
न कोई भी प्रपंच;अपने मन के सरपंच
वो बेतुकी सी बातों पर रूठ रूठ जाना
मचलकर रोने लग जामा
मुश्किल है इसको भुलाना बचपन था ऐसा खजाना
वो भोला भाला चेहरा; न दाग कोई गहरा
चेहरे पर नई चमक; आँखों में उमदा सी दमक
वो चलना ठुमक ठुमक ;खुश रहने की ललक
अौर जो कुछ कहना कह देना बेझिझक
न कुछ पाने की आशा; न खो जाने की निराशा
सब कुछ था बस नया सा; न थी कोई हताशा
वो वाणी थी मधुर ;अब न जाने गयी किधर
वो तुतलाना वो हकलाना
मुश्किल है इसको भुलाना; बचपन था ऐसा खजाना
न पडाई की चिंता न लाइफ की कोई टेंशन
बस मस्ती की लाइफ एक प्यारा सा जंक्शन
हर रोज नया खेल हर रोज नया फंक्शन
बस मस्ती ही मस्ती ; मस्ती में डूबा मन
उत्तम नहीं अतिउत्तम है बचपन
हर रंग मे घुल जाना ; हर माहौल में ढल जाना
मुश्किल है इसको भुलाना बचपन था ऐसा खजाना
एक अँगूठे से हो गयी कट्टी
अौर जुडी दो उँगली सो हो गयी चुम्मी
काश फिर से वो दिन आ जाये
हमको हमारा बचपन मिल जाये
10-20 रूपये तो कागज के नोट; 2-5 रूपये में हम लोट पोट
न तमन्ना बडा होने की ; बस एक गजब सी ललक खुश अौर स्वतंत्र रहने की
न चिंता न कोई खेद; न जात-पात का भेद
खुशी ही खुशी थी न था कोई गम
बडे ही खुशमिजाज के थे हम
मुश्किल ही नहीं नामुंकिन है इसको भुलाना
बचपन था ऐसा खजाना
वो शरीर था पावन अौर स्वभाव मनभावन
वो पिता का प्यार ; वो माँ का दामन
हर मौसम जैसे सावन
वो कागज की नाव वो प्लास्टिक की गन
ऐसे प्यारे बचपन को शत शत नमन
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X