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कलयुगी मानव

                
                                                         
                            पाप पुण्य का लेखा जोखा
                                                                 
                            
अपने आधार पर तय किया
खुद को ज्ञानी मान कर
अपने ही ज्ञान को क्षय किया

ज्ञान परिवेश में पड़ा रहा
पर अहंकार में खड़ा रहा
अब तू सोचे कौन हूँ मैं
अब तक क्यों मौन हूँ मैं

तो सुन

मैं कलयुग का मानव हूँ
बिन दांतो का दानव हूँ
ऊपर से राम बना रहूँ
पर अंदर से तो रावन हूँ
हाँ, मैं रावण हूँ

मैत्री में भी छल किया
दावे अटूट और अटल किया
ना प्रेम भी मेरा सच्चा था
खुद को निर्दोष बनाने को
बोल दिया दिल बच्चा था
भले मन मैला हो मेरा
पर बताता पावन हूँ
ऊपर से राम बना रहूं
पर अंदर से तो रावण हूँ
हाँ, मैं कलयुग का मानव हूँ

अपनी जीत के लिए हमें
दूसरों को गिराना आता है
कोई हमसे बेहतर बन जाए
ये हमें नही फिर भाता है
ताप जहन में ले घूमूं मैं
पर दिखाता सावन हूँ
अभी परिचित नही तुम मुझसे
मैं कलयुग का मानव हूँ
ऊपर से राम बना रहूँ
पर अंदर से तो रावण हूँ
हाँ हाँ रावण हूँ
-रितेश
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एक वर्ष पहले

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