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मेरे अल्फाज़

~~वो "माँ" है~~

Rishikesh Yadav

5 कविताएं

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क्या कहूँ वो वर्ण है ही नहीं;
जिससे कि उसकी कहानी लिखूँ,
उससे बड़ा कोई दामन नहीं;
जिसमें की अपना सहारा बनूँ।
ऐसी कहानी इससे पहले कभी मुकम्मल न देखा,
उसके लब्ज़ ही ऐसे, कि कोई ऐसी गज़ल न देखा।
उससे बढ़कर न कोई ममता,
न उससे बढ़कर कोई निर्मलता,
वो गंगा ही पावन है, संगम ही उसका मन है,
खुश हैं हम कि वो "माँ" है।
ममता के इस छोटे से कोने में अपार विह्वलता देखा,
ये तारा कितना खुशनशीब,
कि उस मनमंदिर जैसा कोई महल न देखा।
उस पावन ह्रदय में जहाँ बसता हूँ मैं,
वो तो सुख का धीरज है, जहाँ अमन चैन लेता हूँ मैं।
जो एक एक पल की ख़ुशी, गिन गिन रहा करती है,
देख खुश जिगर के टुकड़े को, सुख की साँसें लिया करती है,
एक एक चाहत पूरा करती, दुनियाँ में ऐसी कोई पहल न देखा,
नलिनी वो, कि डूबी सलिल में, ऊपर मैं पर्ण बनके,
ओ रे खुदा! इस जहाँ में ऐसा कोई कमल न देखा।...-RISHIKESH YADAV.



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