जहां धूप थी घनी वहां
छांव बनकर तू आई।
सहे कष्ट हजारों तब
इस दुनियां में हमें लाई।।
तेरे आंचल सा सुकून
हमें कहीं ना मिला है।
सलामत हैं आज हम
ये तेरी ममता की दुआ है।।
मुश्किलें जहां की सारी
ममता के आगे झुकी हैं।
हर आती बलाएं तूने
दुजी तरफ मोड़ दी हैं।।
खुशनसीब हैं जो तेरे
आंचल में जीवन बिताया।
जी सकें जिंदगी अपनी
इस काबिल हमें बनाया।।
संघर्षों की भट्टी में तप
मां की ममता निखरी है।
निस्वार्थ प्रेम की छांव में पल
ये जिंदगी संवरी है।।
उस रब से बस इतनी सी
दुआओं का मिले सहारा।
सर पे हमेशा आंचल
सलामत रहे ये तुम्हारा ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X