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प्रयागराज का पर्यावरण

                
                                                         
                            गंगा–यमुना के तट पर बसा,
                                                                 
                            
प्रयागराज का अनुपम आँगन,
जहाँ सरस्वती की धारा भी
अदृश्य हो करती स्पंदन।

हवा में अब भी है हरियाली की गूँज,
पर कहीं धुँध और धूल ने
नील गगन को किया है दूषित,
पवन भी लगती है कुछ मौन।

पीपल, नीम और अशोक की छाँव,
कभी थी जीवन का उपहार,
अब कंक्रीट की भीड़ में घुटती,
हरियाली हो रही है लाचार।

कुंभ के मेले की पावन बयार,
जहाँ लाखों दीप जगमगाते हैं,
वहीं नदी की लहरों में
कचरे के बोझ भी तैर जाते हैं।

हे प्रयागराज!
तेरा वैभव तभी सजीव रहेगा,
जब हर नागरिक प्रण करेगा –
नदी को गंगा ही रखेगा,
पेड़ों को अपना आँगन देगा,
धरा को माँ समझकर
उसकी गोद स्वच्छ रखेगा।

यही संकल्प हमारा हो,
प्रकृति ही सबसे प्यारा हो।
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11 महीने पहले

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