सुलगे ख्वाबों से धुंआ उठा है, लगता है कोई दिल टूटा है,
कई राही अपने हमराह से बिछड़े हैं,
दामन से छूट गुलाबो के फूल, हथेलियों को छोड़ महबूब के,
आज जमीं पर बेजान बिखरे हैं,
ठुकराकर चांद को, जा सहर ने शम्मा से नाता जोड़ा,
पर चांद तब भी चांद है नायाब,
यूं ही तेरा होना ही मेरे दिल की तसल्ली को काफी है,
वो हक़ीक़त हो चाहे कोई ख़्वाब,
मेरे पर्वती ज़िगर में फूटती है तेरी याद हर रोज झरनों सी,
मैं भीगता हूँ पूरी–पूरी रात,
चेहरे पर सादगी देख, हर मौसम में गमगीन दिल का हाल,
भिगोने चली आती है मौसमी बरसात,
लचकती टहनियों से थम गई है आनी झुंझनुओं की
सारंगोशी भरी आजकल आवाज,
मेरी नींदों को ठहर मिल जाए, बसर मिल जाए,
एक सफर मिल जाए कि मुझको आज।
चल कदम लम्हों–लम्हों पर सांस बचाए रखता हूँ,
तू आ न जाए कही से लौट,
तेरी एक आवाज को सुन, जिंदगी के हर मुकाम छोड़,
आ जाऊंगा वहीं से लौट,
कि जब यही है मंजूर जान–ए–करार तुझको,
मेरी तड़पन, मेरे आजार,
तेरा दिया हुआ सब कुछ सह लूंगा, तेरी तमन्नाओं से
निकली, आहें भी हज़ार,
किसी ने कहा बिल्कुल सही, धूप से साए नहीं डरते,
धूप के बिना अंधेरे नहीं मरते,
मुनासिब है तेरा अपनी पसंद के साथ ज़िंदगी जीना,
हम भी जिएंगे उम्मीद करते,
मेरी जागी हुई नींदों का न पूछने आना कभी हाल,
मेरी तमन्नाओं के ख्वाबीदा परवाज़,
मेरी नींदों को ठहर मिल जाए, बसर मिल जाए,
एक सफर मिल जाए कि मुझको आज।
– ऋषभ भट्ट
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