रेस्टोरेंट्स में खाने को रेटिंग,
खाना घर लाए तो डिलेवरी बॉय को रेटिंग,
वैरायटी रेटिंग, टेस्ट रेटिंग और भी बहुत..,
लेकिन एक वो, जो हमारे घर में
हर रोज खाना बनातीं है,
रोटी हमारे थालियों तक लाती हैं,
उन्हें आपने कितनी बार रेटिंग दिया है?
रेटिंग्स तो माँ भी डिजर्व करती हैं यार।
पापा को आलू के पराठे पसंद हैं,
बहन को पलक की सब्जी,
मुझे राजमा चावल और
छोटे भाई को– बूंदी रायता,
पर मम्मी, उन्होंने कभी बताया ही नहीं..,
हां, वो अक्सर बताती थीं,
मौसी जी फ्राई राइस की शौकीन थीं,
मामा को खाने के साथ सलाद चाहिए होता था,
नाना जी सत्तू बड़े चाव से पीते,
पर नानी माँ? उनके बारे में भी कभी बात नहीं किया..,
मेरी दादी सुनती है.. पापा के बचपन के किस्से,
अगर उनको कढ़ी मिल जाती,
तो वो सबसे ज्यादा रोटियां खातें,
बुआ जी, आम मिल जाए
तो मुरब्बा बनाने लगातीं और सबसे छुपातीं,
बड़े पापा, उनका तो चावल के बिना
जैसे खाना ही नहीं होता,
दादा जी रोटियां घी से निपोड़ कर खातें,
मगर दादी माँ, उन्हें क्या खाने में क्या पसंद था?
शायद घर में किसी को नहीं पता..,
माँ, नानी माँ, दादी माँ,
इन सबने सबकी पसंद को यूं अपना मान लिया,
कि जैसे खुद का ही टेस्ट भूल गई हों,
रेस्टोरेंट्स में हमने, फूड क्वॉलिटी रेटिंग,
स्टॉफ बिहेवियर रेटिंग और
सर्विस स्पीड जैसे बहुत रेटिंग दे दिए,
अब एक बार, रेटिंग्स तो माँ भी डिजर्व करती हैं।
सिर्फ खाना ही नहीं,
ये दायरा तो बहुत बड़ा है,
लोग कहते हैं भगवान के नाम जप से
सारी गलतियां माफ हो जाती हैं,
लेकिन माँ?
उनके लिए तो बिना कोई फेवर के भी
हम हमेशा बेकसूर होते हैं,
या शायद, उनका राजा बेटा/बेटी बस नादान हैं,
गलत थोड़ी न?
शायद यही वजह है,
कि माँ को भगवान से भी बड़ा कहा गया है,
क्योंकि भगवान को बुलाना पड़ता है,
और माँ बिना बुलाए ही हर बार मौजूद होती हैं,
इस स्पीड को कितनी रेटिंग मिलनी चाहिए?
क्या फाइव आउट ऑफ फाइव (5/5)?
ये मैं आप पर छोड़ता हूँ..,
बस याद रखिए, रेटिंग्स तो माँ भी डिजर्व करती हैं।
– ऋषभ भट्ट
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