मेरे हक में खिले हों फूल, उन्हें तोड़ दोगी क्या?
बहलाकर दिल अपना, मुझे भी छोड़ दोगी क्या?
ये शौक़ के साबिस्ताने, झिलमिलाते शम्मा–ए–खम,
है लगता खेलते हैं पाकर मेरे मिजाज़ नर्म,
कमबख्त देखो न, होंठ भी उसके आने पर ही खिला करे,
मेरी तन्हाई में जैसे उसकी परछाईं आके मिला करे,
तजुर्बे से बताया था किसी इश्क़ वाले ने, मत लड़ो,
दिलो–दिमाग की लड़ाई में दिमाग को जीत जाने दो,
दिल के पीछे मत पड़ो,
भला वो दिल मान जाता कैसे? जो अबतक हथेली डुबाया न था,
दिले–आज़ार की दुनिया में, जो अबतक दर्द ही को पाया न था,
उसने कहा, ‘मैं साथ रहूंगी’, पर किसके बताई नहीं,
मेरे नाम रात करके कई रात फिर आई नहीं,
कि पूछना है, घर से मेरी राहें अपना मोड़ दोगी क्या?
दिल तोड़कर मेरा किन्हीं का जोड़ दोगी क्या?
मेरे हक में खिले हों फूल, उन्हें तोड़ दोगी क्या?
बहलाकर दिल अपना, मुझे भी छोड़ दोगी क्या?
– ऋषभ भट्ट
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