ओ मेरे प्रिय तुम्हें वह ढूंढकर यहां लाना है,
मुझे कुटिया को अपनी मृग से उस सजाना है,
घने इन जंगलों में सिंह से उसको बचाना है,
मुझे कुटिया को अपनी मृग से उस सजाना है,
नहीं देखा था मैंने धरती की सुनहरी ऐसी छाया को,
न जाने किस जहां से इस धरा पर आया वो?
मेरे इन नैन में बस सी गई है उसकी छवि,
हृदय को छू मेरे जैसे बगल से हो गुजरा अभी,
उठे संदेह उर के उसे छूकर मिटाना है,
मुझे कुटिया को अपनी मृग से उस सजाना है।
चमन ने रंग हर उसके बिना सूनी सी है,
पुकारा नैन से सिय को, नजर बातूनी सी है,
क्षणिक ही कर गया वो वार्ता मौन रहकर ही,
बिना उसके न मानेंगे अश्रु रहेंगे बहकर ही,
ले आओ मृग यदि अश्रु पोछने को भुज बढ़ाना है,
मुझे कुटिया को अपनी मृग से उस सजाना है।
कल रात स्वप्न में एक पुत्र मैंने पाया था,
यकीनन मृग ही ये स्वप्न बनकर आया था,
हमारी कुटिया पे फेरो निगाहें कुछ तो खाली है,
मनोहर पुष्प की कोई उसमें कनक हरियाली है,
श्रृंगारों को मेरे उसका भी नाम पाना है,
मुझे कुटिया को अपनी मृग से उस सजाना है।
ले जाओ शेष को भी, मैं ठहरी यहीं,
चमन में घूम वो वापस आ जाए न कहीं,
लगा आवाज मैं फिर सबको बुला लूंगी,
अगर वो मिल गया सीने से इस लगा लूंगी,
निकल न जाए दूर उससे पहले पता लगाना है,
मुझे कुटिया को अपनी मृग से उस सजाना है।
– ऋषभ भट्ट
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