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मशवरा

                
                                                         
                            ख्वाहिशों ने चाहा हम मिल न पाएं,
                                                                 
                            
आँखें बिछाकर राह कितनी सजाएं?
दूरियों में नजदीकियों की बात आई नहीं,
मंजिलें ही रास मुझको आई नहीं,
कि दिल अब तुम्हारा है, तुम्हारा रहेगा,
न होकर भी मेरा, तूं सहारा रहेगा।

ये किनारों की ललक किस धार में है?
मेरी मौजूदगी तेरे एतबार में है,
हवाओं में रूठापन, स्वाद खारा हुआ,
गुमसुम जमीं से जहां का सितारा हुआ,
फलक आसरों में तुम्हारे बहेगा,
न होकर भी मेरा, तूं सहारा रहेगा।

सुरमई सी चंचल इरादें हैं,
पड़े कुछ अधूरे भी वादें हैं,
ये याराना निभाया नहीं जाए अकेले,
मेरी हसरतों पे हक अपना आ ले ले,
मधुर बोल जुबां से जिक्र तेरी कहेगा,
न होकर भी मेरा, तूं सहारा रहेगा।

एक मशवरा सहर ने उठाई,
कली रात दिल में जो कल मुरझाई,
उन्हें ताज़गी की हवाएं ला दो,
खुद को मेरी जां सजाएं न दो,
गमों में पला पल आवारा फिरेगा,
न होकर भी मेरा, तूं सहारा रहेगा।
– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

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