द्विग–युगल नैन मिलके, क्षण बना दो अमर,
है सिया देखती, तुम भी देखो इधर,
धनुधर तुम्हें चित कर विदित आ रही है,
कर्ण सुहाए, कनक भा रही है,
इक तरफ फूल है, सारे भौंरे इक तरफ,
इक तरफ सृष्टि है, इक झलक इक तरफ,
लख रही जानकी, लक दो तुम भी इधर,
है सिया देखती, तुम भी देखो इधर,
द्विग–युगल नैन मिलके, क्षण बना दो अमर,
है सिया देखती, तुम भी देखो इधर।
है नमन! मात सूरज ये जिसने जनी,
चन्द्र मेरे प्रिये मैं विधुलेखा बनी,
क्या तुम्हीं ने विधाता रूप ऐसा लिया?
हुई सबसे मगन इस जगत में सिया,
साँस, कुछ और पल भर लो रघुवर ठहर,
है सिया देखती, तुम भी देखो इधर,
द्विग–युगल नैन मिलके, क्षण बना दो अमर,
है सिया देखती, तुम भी देखो इधर।
– ऋषभ भट्ट
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