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गद्दार

                
                                                         
                            जंग खत्म कर दो मैं हार कर खड़ा,
                                                                 
                            
मेरा शहंशाह ही मुझको मार कर खड़ा,

गर्दन किन दुश्मनों की उतारूं अब?
कोई अपना ही दहलीज पार कर खड़ा,

जीना था उम्र भर जिनके लिए,
जीना ही वो दुश्वार कर खड़ा,

ईमान पर कालिख लगी है, फिर भी –
कहना है खुद को संवार कर खड़ा,

मेरे हाथों में तलवार की ताकत,
सिर को धड़ से उतार कर खड़ा,

मंजिल से चाह इतनी थी मुझको,
क़दमों को खुद के लाचार कर खड़ा,

दिलनशी का किस्सा आज देखो,
दिल्लगी को अपने गद्दार कर खड़ा।
– ऋषभ भट्ट
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6 महीने पहले

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