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वो चूल्हे पर कविता पकाती है

                
                                                         
                            नीली लपटों का एक चौकोर मौन,
                                                                 
                            
लोहे की जाली पर बिछी हैं अधूरी ध्वनियाँ।
वह लकड़ी नहीं झोंकती,
सुलगाती है अपनी चुप्पियों की छीलन।
तवे की कालिमा में तैरते हैं
बिना छंद के अक्षर—
कुछ चटकते हैं राई की तरह,
कुछ नमक होकर घुल जाते हैं।
आटा गूँथती हथेलियों में
शब्दों का लचीलापन है;
हर लोई एक विचार,
हर बेलन एक लय।
पर वह रोटी नहीं पलटती—
पलटती है एक पंक्ति,
जो तवे पर फूलकर
आसमान जितनी गोल हो जाती है।
धुएँ का सिरा
छत की दरारों से बाहर निकलता है,
एक अमूर्त मेटाफ़र बनकर।
भूख मिटाने का हुनर नहीं यह,
यह तो अंगारों पर
अपनी भाषा को तपाने की ज़िद है।
चूल्हा बुझता है,
राख ठंडी होती है,
और रसोई की दीवार पर
एक ताज़ा, गर्म नज़्म
भाप बनकर थरथराती रह जाती है।
-रमेश मेंदीरत्ता
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3 घंटे पहले

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