चाँद पर ज़मीन तलाशने वालों ने पहले अपनी ज़मीन का क्या हाल किया है, इसी पर पेश है एक तीखा हास्य-व्यंग्य:
चाँद पे क्या रखा है!
साहब चले हैं चाँद पे बस्ती बसाने,
ज़मीन पर कचरे का पहाड़ बनाने।
कहते हैं— "वहाँ पानी की खोज जारी है!"
इधर अपने यहाँ की नदियाँ नाली बनी बेचारी हैं।
साँस लेने को यहाँ ऑक्सीजन का सिलिंडर चाहिए,
पर मँगल और चाँद पे इन साहब को प्लॉट चाहिए!
पेड़ सारे काट दिए, कंक्रीट का जंगल सजा दिया,
धरती माता का तो हमने बैंड-बाजा बजा दिया।
ज़मीन की ऐसी-तैसी करके बोले— "अब स्पेस में जाएँगे,"
लगता है कचरे के डिब्बे अब वहाँ भी चमकाएँगे!
गाड़ियों के धुएँ से आसमान काला कर रखा है,
फिर पूछते हैं मासूम बनके— "अरे! चाँद पे क्या रखा है?"
चाँद पे जाएँगे तो प्लास्टिक के पैकेट वहाँ भी फेंकेंगे,
सुना है चाँद पर दाग़ है, उसे और गंदा करके देखेंगे!
कड़वा सच: जिस दिन चाँद पर पहला इंसान बसेगा, शायद उस दिन धरती पर पहला इंसान ढूँढने से भी नहीं मिलेगा।
अब कुत्ते भी सोच में पड़ गए हैं!
इंसान की अक्ल पर तो अब कुत्ते भी हँस रहे हैं,
"ये साहब ज़मीन छोड़, किस अंतरिक्ष में फँस रहे हैं?"
गली का कुत्ता भी भौंक के कह गया एक बात तीखी:
"अरे इंसान! हमसे ही सीख लेता थोड़ी वफ़ादारी सीखी-सीखी!
जिस ज़मीन ने तुझे अन्न दिया, आसरा दिया, रहने को घर दिया,
तूने उसी का सीना चीर के, उसे धूल और धुएँ से भर दिया।
हम तो ज़मीन का एक टुकड़ा पाकर भी दुम हिलाते हैं,
और ये जनाब! पूरी धरती बर्बाद करके, चाँद पे प्लॉट के सपने सजाते हैं!"
इंसान अगर चाँद पर पहुँच भी गया, तो कुत्ता मुस्कुरा के कहेगा:
"साहब! वहाँ भी पोल (खंभा) ढूँढोगे, या मेरा ही इलाक़ा रहेगा?"
एक और कड़वा सच: इंसान भले ही चाँद तक पहुँच जाए, पर वफ़ादारी और धरती से प्यार के मामले में आज भी वो कुत्ते से मीलों पीछे है!
-रमेश मेंदीरत्ता
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