कभी सपने भाप में पकते थे—धीरे‑धीरे, धैर्य से, जैसे दादी के चूल्हे पर चढ़ी खिचड़ी।
अब सपनों का भी फाफ्राई किए हुए सपने स्ट‑फूड युग आ गया है।
लोग कहते हैं—“भाई, जल्दी बनाओ, जल्दी दिखाओ, जल्दी चमको।”
तो सपनों को भी कड़ाही में डालकर तेल में फ्राई कर दिया गया है।
सपना चाहे डॉक्टर बनने का हो या गायक बनने का—
सबसे पहले उसे मसालों में मेरिनेट किया जाता है:
थोड़ा‑सा पड़ोसी का दबाव,
दो चम्मच रिश्तेदारों की सलाह,
और ऊपर से सोशल मीडिया का तड़का।
फिर उसे उबलते तेल में छोड़ दिया जाता है—
जहाँ वह चटख‑चटख कर जलता है,
और हम सोचते हैं—“वाह, प्रगति हो रही है!”
फ्राई किए सपनों की खासियत यह है कि
वे बाहर से कुरकुरे और चमकदार दिखते हैं,
पर अंदर से अक्सर कच्चे रह जाते हैं।
लेकिन समाज को इससे क्या?
उसे तो बस प्लेट में सजावट चाहिए—
चाहे सपना आधा जला हो या पूरा कच्चा।
आजकल बच्चे भी सपने नहीं देखते,
उन्हें सपने दिखाए जाते हैं—
जैसे टीवी पर विज्ञापन:
“सिर्फ तीन महीने में सफलता!
सिर्फ पाँच कदमों में महानता!
सिर्फ एक क्लिक में भविष्य उज्ज्वल!”
और बेचारे बच्चे सोचते हैं—
“अरे, इतना आसान है? चलो, फ्राई कर ही लेते हैं!”
माता‑पिता भी कम नहीं—
वे सपनों को ऐसे पलटते हैं
जैसे पराठा पलट रहे हों।
“इंजीनियर बनो—नहीं?
तो डॉक्टर बन जाओ—नहीं?
तो सरकारी नौकरी कर लो—नहीं?
तो कम से कम यूट्यूबर ही बन जाओ!”
सपना बेचारा सोचता है—
“मुझसे पूछा भी है कभी?”
फ्राई किए सपनों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि
वे जल्दी ठंडे पड़ जाते हैं।
पहले तो गरमागरम उत्साह,
फिर हल्की‑सी भाप,
और अंत में प्लेट में पड़ा एक ठंडा,
तेल से लथपथ,
बेजान‑सा टुकड़ा—
जिसे देखकर लोग कहते हैं—
“अरे, इसमें दम नहीं था!”
और हम?
हम नए सपने तलने में लग जाते हैं।
क्योंकि असली, धीमी आँच पर पकने वाले सपनों में
मेहनत लगती है, समय लगता है,
और सबसे बड़ी बात—
धैर्य लगता है।
जो आजकल किसी के पास नहीं।
इसलिए सपनों को फ्राई करते रहिए—
कुरकुरे दिखेंगे,
लोग वाह‑वाह करेंगे,
और आप सोचते रहिए—
“कभी तो कोई सपना ऐसा होगा
जो तेल में नहीं, ..
दिल में पकेगा। ...
-रमेश मेंदीरत्ता
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