सूर्य के छुपने में
इंतज़ार है भोर के होने का।
हवा आई है—
झूम लूँ,
इस मौसम का थोड़ा नूर लूँ।
थोड़ा नाचूँ,
गाऊँ,
और आँखों से इसे निहार लूँ।
क्या पता,
फिर मिलन न हो...
तू रहे,
पर मैं न रहूँ।
जब तक तू याद है,
थोड़ा डर,
थोड़ी निराशा है,
साथ ही—
ज़िंदा होने का एहसास है।
और...
बिछड़ने में ही
मिलन का एहसास है।
अगर ग़म न हो
जाने का,
खोने का,
और रुकने का—
तो रोशनी कभी दिखे नहीं,
हवा कभी बहे नहीं,
पेड़ कभी लहराए नहीं,
मोर कभी नाचे नहीं।
अहसान है इस मौत का,
जो मुझे हर पल
ज़िंदा रखती है।
मुझे जीने का सलीका सिखाती हैं,
जब-जब तेरी,
याद आती है।
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