मन के रावण को कब दफनाओगे
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रे मनुष्य
अपने मन के रावण को
कब दफनाओगे
कागज के पुतले को फूंक
क्या सच में बुराइयों के आतंक से मुक्त हो पाओगे
झूठा ये त्योहार मना के
अपने आप से छल कर
जाओगे
सच मन के रावण को
कब दफनाओगे
जब तक जिंदा है रावण
तमाशा खूब होता रहेगा
आतंकों के स्वर में भारत मेरा
जलता रहेगा
रावण सदृश मन के विकारों से मुक्त होकर
राम बनकर दिखाओगे
क्रोध, छल ,कपट,कलह,द्वेष
अनाचार,अत्याचार से अपने को मुक्त कर जाओगे
बुराई पर अच्छाई का उदाहरण बनकर सामने आओगे तब ही सच्चे अर्थों में
पावन दशहरा का त्योहार मना पाओगे।
रेनू शर्मा, जयपुर
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