तुम पढ़ लेते हो मेरा मौन,
आँखों में तैरता हर प्रश्न,
बातों में छुपे उस दर्द को,
कर लेते हो पल में ग्रहण।
मेरी कविता से पहचान लेते,
तुम मेरे अंतर्मन का कष्ट,
आहट पाकर मेरे कदमों की,
पीड़ा मेरी कर देते स्पष्ट।
आने वाले कल की आहट,
तुम पहले ही सुन लेते हो,
मेरी उलझी हुई सी सांसों में,
तुम सुकूँ का रंग बुन देते हो।
सुनकर तुम्हारी आवाज़ प्रिय,
मैं भी रुक सी जाती हूँ,
बहती हूँ तुम्हारी बातों में,
एक नई ऊर्जा पाती हूँ।
मन अक्सर ठहर-सा जाता है,
सोच यही दोहराता है-
तुम ऐसा कैसे कर जाते हो?
इतना प्रेम कहाँ से लाते हो?
-रेखा मित्तल
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