इश्क़ को इबादत समझने लगा है यहां एक शक्स,
क्यूं ना उसे आज के इस दौर से वाकिफ़ कराया जाए।
रह गया महज़ कागज़ पन्नों पर दर्ज़ वो एक लफ्ज़,
चाहत क्या है अब कैसे किसी को समझाया जाए?
तुम आज भी मुझे जान से प्यारी हो,
दिक्कत ये है की अब कैसे तुम्हें भूलाया जाए?
तुम्हारी याद ने फ़िर दावत-ए-सुखन दी इन अश्कों को,
दिल ने चाहा की फ़िर तुम्हे गले से लगाया जाए।
भूला दिया जाए कुछ बीती बातों कुछ दर्द भरी यादों को,
उम्मीदों की लोह से मोहब्बत का नया दीप जलाया जाए।
साज़िश-ए-मोहब्बत का शिकार बन गया एक चिराग,
फतवा जारी हुआ रेहान के वजूद को मिटाया जाए।
हर वक़्त शराफ़त का नाकाब पैने रखता है वो,
कभी तो ज़माने को उसका असली चहरा दिखाया जाए।
हुस्न-ए-मेहताब को देख बेकाबू हो जाता है हरदम,
इस दिल को काबू में रहना सिखाया जाए।
दिमाग कहता है अब खता-ए-इश्क़ ना हो दोबारा,
दिल-ए-नादान का कहना है
उस गलती को एक बार फ़िर दोहराया जाए।।
- रेहान कटरावाले
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