हूं सोचता मैं हर घड़ी ,
वो ज़िन्दगी आबाद सी ।
वो मस्तियां, नादांनियां,
वो ख़्वाहिशें शहज़ाद सी ।
ना इल्म था किसी बात का,
ना फ़िक़्र थी किसी बात की।
चैन था, सुकून था,
और वो नींद थी मीठी रात की।
ना रंज था, ना ग़म था,
ना डर था किसी बात का।
खेलना ही ख़्वाब था,
और पढ़ाई थी अज़ाब सी।
हूं सोचता मैं हर घड़ी ,
वो ज़िन्दगी किताब सी।
जहां किस्सो का साथ था,
और सपनों की बात थी ।
अब जी रहा हूं हर घड़ी,
ये ज़िन्दगी मैं ख़्वाब सी ।
न जिसमे है हक़ीकत ,
बस बातें है मुराद की ।
अब इल्म है हर बात का ,
और फ़िक़्र है हालात की,
वक़्त है, मंज़िल भी है,
बस देर है शुरुआत की।
फिर सोचता मैं उस घड़ी ,
वो ज़िन्दगी आज़ाद सी।
वो मस्तियां , नादानियां ,
वो ख़्वाहिशें शहज़ाद सी।
~रिजिन शाह
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