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क्या ज्ञात है किसी को इतिहास सांसों का

                
                                                         
                            क्या ज्ञात है किसी को इतिहास सांसों का
                                                                 
                            
बनते बिगड़ते किरदारों के भिन्न-भिन्न एहसासों का
मैंने देखा है कईयों को सांसों में अटकते हुए
जुबां ठहरी-नजर बोझिल फिरभी सांसों से लड़ते हुए
कभी किसी की भय से सांस गले में आ जाती है
गला दबाकर ही किसी की सांसें रुकाई जाती है
जन्म लेते हर जीव की पहली सांस सृष्टि का सृजन है
पहली सांस के बाद जो बनता है उसका जीवन है
सांसों की लकीर अनथक प्रवाही रहती है
अंतिम सांस के पश्चात् भी स्मारकों में चलती है
दफ़नाया जाता है किसी को इस आस में अक्सर
अनहोनी हो कर क्यों न हो चल जाए तो बेहतर है
ये खेल सांसों का सब जानते हैं भुलभुलैया है
मगर क्या कोई सांसों को ठुकरा पाया है
कुछ लोग कहते हैं भाई सांस है तो आस है
पर देखने में आता है सभी को सांस की ही आस है
-कवि 'रवि'
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58 मिनट पहले

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