साठ का पाठ
कर लिया साठ वसंत की गिनती
कुछ जेठ की दुपहरी सी तपती
कुछ भादो सी मूसलाधार बरसती
कुछ पूस की ठण्ड सी ठिठुरती
कुछ सावन सी हरी भरी रहती।
आसीन की धूप थी चिचिलाती
चमकता चाँद नाक पर ऐनक
पहुँचा विद्यापीठ, भूलते भागते
सपने पकड़ने, गाने मन के गीत।
द्वारपालिन कौतूहलवश पूछती
आप भी एडमिशन लेने आये हैं?
मेरे हाँ कहते ही ठहाका लगाती
अजूबेपन से साक्षात्कार समझते
उसके हाल पर मन ही मन मुसकुराते
एडमिशन हॉल की तरफ बढ़ जाते ।
जाँचकर्ता सनद देख जड़ता छिपाते
परिचय जब देता, सहपाठी ऊब से जाते
शिक्षक मेरा भूगोल देख इतिहास पूछते
निज ज्ञान बताने को प्रश्नबाण चलाते
छात्रत्व का नित एहसास कराते।
पर जब मालूम है जन्नत की हक़ीक़त,
तो फिर दोज़ख से क्यों घबराते?
गए माघ, अब उन्तीस दिन बाकी,
तरकश में बाण सुरक्षित आगे बढ़ जाते !
~ रवीन्द्र कुमार मिश्र
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