आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रकॄति का संदेश

                
                                                         
                            ऐ धरा के बुद्धिजीवी, बनते हो तुम बहुत महान।
                                                                 
                            
चोट प्रकृति कोपहुँचाकर तुम,कहते खुद को बुद्धिमान।
बेशक बुद्धि के बल पर है, तुमने खूब विकास किया।
पर क्या सोंचा अगली पीढ़ी, का कैसे होगा उत्थान।।

अगर नही चेते तो तुमको, माफ पीढ़ियाँ नही करेंगी।
जल संरक्षण नही किये तो, याद पीढ़ियाँ नही करेंगी।
आने वाले कल की मानुष, तनिक कल्पना कर लेना,
जब होगी प्यासी धरती,और प्यासा होगा हर इंसान।।
रवि 'विद्यार्थी'
सिरसा मेजा प्रयागराज


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर