गज़ल-
वो छत पर नजर जब से आने लगे हैं।
नज़र से नज़र को पिलाने लगे हैं।।
खामोश नज़रे हैं उन्हें ढूँढती बस।
जो नशा मुझपे अपना चढ़ाने लगे हैं।।
वो हँस दे अगर तो बिखर जाए खुशबू।
जो गुलशन मेरे दिल को बनाने लगे हैं।।
नाशाद मन को खुशी देने वाले।
मेरे दिल में नक्शा बनाने लगे हैं।।
मुझे है ख़लिश कि उन्हें खो न दूँ मैं।
जो दिल में मेरे अब समाने लगे हैं।।
उन्हें लगता है कि मैं नाजुक बहुत हूँ।
यही सोंच वो इतराने लगे हैं।।
दिल अपना उनपे कुर्बान करके।
हम उनकी चाँदनी में नहाने लगे हैं।।
रवि 'विद्यार्थी'
सिरसा मेजा प्रयागराज
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