मौत को बेहद करीब से देखा है मैंने,
रोटी की खातिर इंसान को रोते देखा है मैंने।
महलों में रहने वालों को क्या खबर भूख की,
फुटपाथों पर बचपन को रोते देखा है मैंने।
चंद निवालों की खातिर बिकते हैं खिलौने,
मासूम हाथों को मजदूरी करते देखा है मैंने।
चूल्हे की राख में सपने जलते देखे हैं,
भूखी आँखों में आँसू पलते देखे हैं।
जहाँ उम्मीदों के दीपक बुझ जाते हैं आकर
उस अँधेरी कोठरी में लाचारी देखी है मैंने।
कहीं थालियों में खाना बचा फेंका जाता है,
तो कहीं बच्चा एक निवाले को तरसता देखा है मैंने।
अमीरी की महफ़िल में पानी-सा धन बहता है,
और उसी धन के लिए खून-पसीना बिकते देखा है मैंने।
जिस शहर में दौलत के बाज़ार सजे रहते हैं,
उसी शहर में भूख से मरते इंसान देखे हैं मैंने।
हक़ की बातें किताबों में बहुत लिखी हैं, 'शायर',
मगर हक़ के लिए भूखों को तरसते देखा है मैंने।
किससे कहें कि भूख कोई जुर्म नहीं होती,
पर भूखे बच्चे को पत्थर चबाते देखा है मैंने।
इंसानियत अगर ज़िंदा है तो जवाब दे दुनिया,
क्यों रोटी से पहले धर्म-जाति पूछते देखा है मैंने?
मैंने मंदिर भी देखे हैं, मस्जिद भी देखी है,
पर भूखे इंसान में भगवान को रोते देखा है मैंने।
अब कलम मेरी खामोश रही तो शर्म की बात होगी,
सच लिखने पर ज़माने को जलते देखा है मैंने।
मौत को बेहद करीब से देखा है मैंने,
रोटी की खातिर इंसान को मरते देखा है मैंने।
-रवि शंकर साह
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