ही-ही, हू-हू कर-कर के,
बचपन अपना बीता,
खू-खू, खी-खी कर-कर के,
यौवन अपना बीता।
खो-खो, खो-खो कर-कर के,
बुढ़ापा अपना बीत रहा,
देख समय की चाल निराली—
जीवन अपना अब रीत रहा।
चीं-चीं, चूँ-चूँ कर-कर के,
पोते-पोती सिर चढ़ते हैं,
हूँ-हूँ, हाँ-हाँ कर-कर के,
हम झूठे लेक्चर पढ़ते हैं।
तिजोरी की उस चाबी पर
अब भी थोड़ा सी माया, मोह है,
पर आत्मा चिल्लाकर कहती—
सब माया है, सब द्रोह है।
किर-किर, खिर-खिर कर-कर के,
दाँतों ने साथ धकेला है,
आँय-बाँय, शाँय-शाँय सुनकर,
कानों में अब मेला है।
हरे राम, हरे कृष्ण जप जपकर,
माया का चश्मा उतर रहा,
यमराज खड़े हैं द्वार पर,
पर दिल रसगुल्ले पर अटक रहा!
फूँ-फूँ, खाँ-खाँ कर-कर के,
अब फूँक अपनी निकल रही,
मोह-माया की बर्फ पिघलकर,
सच के साँचे में ढल रही।
राम-नाम की सत्य पटरी पर
अपना डिब्बा घिसट रहा,
साँसों की अंतिम सीटी बजती—
जीवन अपना अब रीत रहा।
मिट्टी मिट्टी में मिलकर अब
मिट्टी का कर्ज़ चुकाना है,
पिंजरा खाली छोड़कर आखिर,
मैना को उड़ जाना है।
संग छूटेगा सारे अपनों का,
जग का मेला छूट रहा,
राम-राम सुमिरन करते-करते,
साँसों का धागा टूट रहा।
हँसते-हँसते जीवन काटा,
रोते-रोते दिन भी ढले,
जिसको अपना समझ बैठे थे,
वो भी राह में साथ न चले।
धन-दौलत सब यहीं रहेगी,
कोई साथ न कुछ ले जा रहा,
कर्मों की गठरी संग लेकर,
इंसान अकेला जा रहा।
ही-ही, हू-हू से शुरू हुआ था,
राम-राम पर अंत हुआ,
माया के इस रंगमंच पर
हर किरदार का अंत हुआ।
आना-जाना लगा रहेगा,
कौन यहाँ सदा ठहर रहा?
समय पुकार रहा धीरे से—
जीवन अपना अब रीत रहा।
-रवि शंकर साह “बलसरा”
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