तुम्हारे शहर में आकर, मैं अजनबी-सा क्यों हूँ,
तेरी ही धड़कनों में रहकर बेगाना-सा क्यों हूँ,
कटहल के फूल-सा महकता हूँ तेरी यादों में,
फिर तेरी नज़र में इतना अनजाना-सा क्यों हूँ।
तेरी साँसों को सीने में बसाकर चल रहा हूँ,
तेरी ख़ुशबू के सहारे हर गली में ढल रहा हूँ,
न जाने कितने मौसम तेरी चाहत में गुज़ारे,
मैं तुझको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ख़ुद से निकल रहा हूँ।
तेरे शहर की हर राह से रिश्ता पुराना है,
हर मोड़ पर लगता है तेरा ही ठिकाना है,
मैं पूछता हूँ लोगों से तेरा पता हर रोज़,
क्या इश्क़ करने वालों का बस इतना फ़साना है?
मैं बादलों से पूछूँ, हवाओं से बात करूँ,
तेरी याद के नाम पर हर शाम मुलाक़ात करूँ,
तू सामने मिले तो ये शिकायत भी करूँ तुझसे,
कितने बरस लगे मुझे, तुझे ख़ुद से याद करूँ।
तुम मिल भी जाओ तो शायद शिकायतें तमाम हों,
कुछ अनकहे से क़िस्से हों, कुछ आँखों के पैग़ाम हों,
मैं साँस-साँस में तुझको लिए फिरता हूँ मानाँ,
तुम पहचान लो मुझे, तो उलफ़त के नाम हों।
--रतन कुमार कैथवास
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