रहनुमा क्यों बन रहे हो बे, मदद करनी है तो कर दो,
बाढ़ में डूबे लोगों के घर तक कुछ राहत पहुँचा दो।
हर काम में अपना चेहरा दिखाना ज़रूरी क्यों है,
दर्द बाँटना है अगर, तो थोड़ा अपना अहं मिटा दो।
रमझल्ला किए बगैर खाना नहीं हजम होता क्या,
हर निवाले के साथ अपना भाषण मत परोस दो।
किसी की टूटी छत को कैमरे से मत नापो तुम,
चूल्हा बुझा है जिसका, उसके घर चुपचाप चूल्हा जला दो।
जिनके बच्चे रातभर भूखे हैं, उन्हें नारे नहीं चाहिए,
दो रोटी, दवा और कपड़े हैं... जो हो सके पहुँचा दो।
रहनुमा बनने का शौक़ है तो एक काम और करना,
बाढ़ उतरने के बाद भी उन बस्तियों में लौट आओ।
मदद अगर सच में मदद है तो शोर कैसा भाई,
नाम-पता रहने दो, बस इंसानियत निभा दो।
-रतन कुमार कैथवास
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