स्नेह से हमने पूछा, ये कैसा हिसाब है,
दिल में ख़ुदा हो तो फिर ये कैसा लिबास है।
मंदिर में ढूँढते हो, मस्जिद में ढूँढते हो,
जो दिल में बस गया हो, वो किसका जवाब है।
हमने तो उलफ़त को ही सजदा समझ लिया,
बाक़ी तुम्हारी रस्मों का अपना हिसाब है।
जिस राह पर मोहब्बत के काँटे भी फूल हों,
उस राह का हर इक क़दम ख़ुद एक किताब है।
तू मुझसे दूर होकर भी मुझमें बसा हुआ है,
तेरा ख़याल ही तो मेरा आफ़्ताब है।
अब कौन बताए मुझको वो जगह जहाँ,
इंसान हो मगर दिल में कोई ख़ुदा न हो।
-रतन कुमार कैथवास
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