तेरी आँखों में जो देखा, वही मय समझ के पी ली,
मेरी प्यास को मगर फिर कोई शाम तक न पहुँचे।
तूने मुस्कुरा के देखा, तो बहक गया था मौसम,
मेरी प्यास का किस्सा तेरे नाम तक न पहुँचे।
मैंने चाहा तुझको इतना कि खुदी भी भूल बैठा,
मेरी चाहतों की आहट तेरे इल्ज़ाम तक न पहुँचे।
तेरी एक नज़र के बदले मैं जहाँ लुटा भी दूँ,
मगर मेरा कोई शिकवा तेरे कान तक न पहुँचे।
तू रहे हमेशा महफ़ूज़ मेरी दुआओं में,
मेरी कोई बद-दुआ भी तेरे मक़ाम तक न पहुँचे।
-रतन कुमार कैथवास
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