समय की तुम खुदाई मत करो, देखो और समझो समय को,
हाँ हाँ, टाइम मैनेजमेंट ही कह रहा हूँ, थोड़ा सँभालो समय को।
सब कुछ कैसे दुरुस्त करें, कुछ तो इसका हिंट दो,
घड़ी तो चलती रहती है, पहले तुम पहचानो समय को।
क्या बिना टाइम-टेबल के भी काम नहीं चल सकता है,
मन कहता है “चल जाएगा”, फिर हर काम क्यों टलता है?
सुबह की सूची बनती है, शाम तलक खो जाती है,
एक काम पूरा होने में, चार कामों का ख्याल आता है।
कभी मोबाइल समय खाए, कभी चाय बुलाती है,
कभी पाँच मिनट की झपकी, घंटों की नींद बन जाती है।
हम सोचें आज बहुत कुछ करना है, सब कर डालेंगे,
फिर रात पूछती है… जनाब, आज किया क्या है?
समय को बाँधना मुश्किल है, दिशा तो दी जा सकती है,
हर घड़ी को काम में ढालो, मंज़िल भी मिल सकती है।
ज़रूरी काम पहले रखो, बाकी थोड़े बाद सही,
हर चीज़ आज ही करनी हो… ये ज़िद भी छोड़ी जा सकती है।
टाइम-टेबल बनाना है तो इतना भारी मत बनाओ,
घंटे-घंटे का हिसाब लगाकर खुद को कैदी मत बनाओ।
तीन काम चुन लो बस, जो आज ज़रूरी लगते हैं,
बाकी कल के खाते में डालो, और आज में मुस्कुराओ।
समय की तुम खुदाई मत करो, उसके साथ चलना सीखो,
दौड़ बहुत लगाई अब तक, थोड़ा रुककर चलना सीखो।
सब कुछ दुरुस्त करने का कोई जादुई मंत्र नहीं,
बस जो समय मिला है उसको, सही जगह पर लगाना सीखो।
-रतन कुमार कैथवास
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