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पुरुष है एक अध्याय, स्त्री पूरी किताब

                
                                                         
                            पुरुष है सफ़र, मंज़िल की तलाश,
                                                                 
                            
स्त्री है विश्वास, उम्मीद और आस।

पुरुष है तर्क, तो स्त्री है विचार,
पुरुष है संघर्ष, तो स्त्री है आधार।

पुरुष है समंदर, गहराई की पहचान,
स्त्री है नदी, जो देती है जीवनदान।

पुरुष है अगर धूप, तपिश और ताप,
स्त्री है छाँव, जो हरती है हर संताप।

पुरुष है प्रश्न, जो मस्तिष्क में पलता है,
स्त्री है उत्तर, जो उसके अनुभव से निकलता है।

पुरुष है एक अध्याय, स्त्री पूरी किताब,
दोनों से मुकम्मल है जीवन का हिसाब।

न पुरुष अधूरा, न स्त्री किसी की मोहताज,
दोनों के संग ही सँवरता है जीवन का साज़।

पुरुष और स्त्री का रिश्ता कोई प्रतिस्पर्धा नहीं,
एक-दूसरे के अस्तित्व का सम्मान है|

जहाँ प्रश्न और उत्तर दोनों को मिले जगह,
वहीं जीवन का वास्तविक समाधान है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

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