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प्रकृति में ही मुक्ति का द्वार मिलता है

                
                                                         
                            आत्म-अवलोकन कर, ख़ुद से मुलाक़ात होनी चाहिए,
                                                                 
                            
आईने के सामने ख़ुद से सच्ची बात होनी चाहिए।

दुनिया को बदलने की चाह में उम्र गुज़र जाती है,
पहले अपने भीतर भी थोड़ी जाँच होनी चाहिए।

प्रकृति की गोद में ही मुक्ति का द्वार मिलता है,
मौन की गहराइयों में जीवन का सार मिलता है।

जो छोड़ दे अहंकार, जो मोह से जाग जाता है,
वही भीतर के अंधकार से बाहर निकल पाता है।

ख़ुद को देखना हो तो ईमान की नज़र से देख,
अपनी कमियों को भी स्वीकार करने के हुनर से देख।
दूसरों के ऐब गिनना बहुत आसान है मगर,
अपने भीतर के सच को भी थोड़े सब्र से देख।

नदियों से बहना सीख, पर्वत से धीरज सीख,
वृक्षों से देना सीख, धरती से धैर्य सीख।
प्रकृति के नियमों में जीवन का ज्ञान छिपा है,
जो उसके साथ जागा, उसने मुक्ति का मार्ग सीखा।

जागना केवल आँखों का खुल जाना नहीं,
अपने भ्रम से निकलना, स्वयं को पहचानना सही।
जिस दिन समझ आ जाए मोह का पूरा खेल,
त्याग के लिए फिर छोड़ना कुछ अलग नहीं।

सच से जो रिश्ता जोड़ता है, वही आज़ाद होता है,
अपने दोषों को मानने वाला ही आबाद होता है।
झूठ की परतों में मन कब तक छिपा रहेगा,
आत्मबोध का सूरज निकले, तो हर भ्रम साफ होता है।
-रतन कुमार कैथवास
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एक घंटा पहले

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