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मेरी खामोशी बोल उठे

                
                                                         
                            दिल में जो दबा है, उसे किससे कहें, किसे सुनाएँ,
                                                                 
                            
किस बहाने से फिर तुम्हारे शहर तक जाएँ।
रोना भी मुमकिन नहीं, हँसना भी आता नहीं,
अब इस ख़ामोशी को आखिर किस नाम से बुलाएँ।

कभी आँसू ही दिल का बोझ हल्का कर दिया करते थे,
अब वही आँसू भी जैसे हमसे रूठकर बैठे हैं।
चलना छोड़ दें तो क्या जिंदगी खत्म हो जाएगी,
शायद थोड़ी देर रुकेंगे तो साँस फिर लौट आएगी।

तेरी गली का पता आज भी हम को याद है,
मगर कदमों को वहाँ ले जाने की कहाँ फ़रियाद है।
रास्ते तो आज भी वहीं से होकर गुजरते हैं,
बस तेरे दर तक पहुँचने की हिम्मत कहाँ आबाद है।

तुम्हें भूलने का दावा भी हमसे हो नहीं पाता,
दिल को समझाएँ तो ये कमबख़्त समझ नहीं पाता।
जिसे अपना कहकर सारी उम्र सँभालना चाहा,
वही रिश्ता अब किसी नाम से पुकारा नहीं जाता।

कभी हवा से पूछते हैं, क्या तुम भी याद करते हो,
कभी बादलों में छुपकर हमारा शहर देखते हो।
ये कैसी सरगोसी है, न मिलना ऐहतराम हुआ,
फिर भी हर राह में तुम्हारा ही पता पूछते हो।

अब न शिकवा रहा, न कोई इल्ज़ाम सुनाएँ,
बस एक बार मिलो, फिर शायद कुछ न बताएँ।
तुम सामने रहो तो शायद मेरी ख़ामोशी बोल उठे,
जो बरसों से दिल में है, वो आँखों से सुनाएँ।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

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