मैं अपनी मुक्ति की ख़ुद रचयिता,
किसी के स्पर्श से क्यों उद्धारी जाऊँ?
क्या मैं अहिल्या हूँ, नहीं मैं आज की बेटी हूँ,
मेरे जीने के तरीके में अपना अहंकार मत दिखाओ।
मैं नदी नहीं, जो राह मिले तो बह जाऊँ,
मैं आग हूँ, अपनी लौ से रोशनी बन जाऊँ,
मेरी पहचान किसी की मोहताज नहीं,
मैं ख़ुद अपनी पहचान बनाऊँ।
मेरे मौन को मेरी सहमति मत समझना,
मैं चाहूँ तो हर दीवार गिराऊँ,
मैं युगों की जड़ मान्यताओं से लड़कर,
अपना इतिहास ख़ुद लिखने आऊँ।
न मैं किसी की दया की पात्र हूँ,
न किसी के वरदान से सँवर जाऊँ,
मैं नारी हूँ, मेरी अपनी सत्ता है,
मैं ख़ुद उठूँ, ख़ुद चलूँ, ख़ुद को तार जाऊँ।
-रतन कुमार कैथवास
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